पेरेंट्स इन बातों को हरगिज शेयर ना करें अपने बच्चों से

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भविष्य का आकलन कर बच्चों की परवरिश को लेकर आज हर माता अधिक चिंतित रहते है। आज पेरेंट्स बच्चो को अच्छी अदातें सिखाने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने लिए के लिए अपनी आय का अधिकांश भाग उनके स्कूल और कोचिंग पर व्यय करते है इसके साथ-साथ वह अपने लाडले से बच्चे को फटकार देने और पिटाई तक करने में संकोच नही करते है।



स्कूल में तो बच्चों को अच्छा ज्ञान मिलता है पर जाने अनजाने माता-पिता के व्यवहार व बोलचाल के  कारण बच्चे की परवरिश में कमी आ जाती है जिसके बाद उन्हें अपने प्रयास निरर्थक लगने लगते है। वैसे तो माता-पिता बच्चे को काबिल बनाने के लिए बहुत सी बातें बोलते है लेकिन वह अपनी बातों के प्रभाव का आकलन नही करते है। आइयें उन बातों की तरफ आपका ध्यान ले जाते है जो एक अच्छे पेरेंट्स को अपने बच्चों से नही करनी चाहिए।





अपनी कमियां जाहिर ना करें : बच्चो पर स्टडी का अधिक तनाव रहता है यह बात बच्चों के मासूम चेहरे पर साफ़ दिखाई देता है इसका अर्थ यह नही है कि आप बच्चों को हल्का महसूस कराने के लिए अपनी स्टडी के दौरान अपनी कमियों को बच्चों के सामने जाहिर कर दें। जब आप बच्चों के सामने अपने कमजोर विषय की बात रखते है तो बच्चें के मन पर आपकी कमियों का बुरा असर पड़ता है और वह पढाई को गंभीरता से नही लेता है जिसके परिणाम आगे चलकर साफ़ नजर आते है।





बात ना मानने का दंड : छोटी उम्र में बच्चों का मन चंचल होता है जिसके कारण वह एक जगह अधिक समय तक नही टिकते और उनकी इस चंचलता को आपने उद्दंडता नही समझ सकते है। अकसर भारतीय समाज में देखा गया है कि माता-पिता के किसी काम को मना करने के बाद भी बच्चे अपनी शरारतों में लगे रहते है और चंचलता में अपने शरीर या फिर अपने खिलौने का नुकसान कर बैठते है जिसके बाद पेरेंट्स अपनी बात की जीत दर्शाते हुए बच्चे को साफ़-साफ़ कह देते है यह बात ना मनाने का दंड है। चोट लगने या फिर खिलौना टूटने के बाद बच्चा दुखी और हल्का डरा होता है और आपकी दंड वाली बातें सुनकर डर अंदर तक दाखिल हो जाता है और वह भविष्य में जोखिम लेने की उसकी क्षमता कम होने लगती है।





पापा का डर : इंडिया में बच्चो के मन में पिता के लिए आदर से ज्यादा खौफ होता है और इसके लिए अधिक जिम्मदार कोई और नही बच्चों की माँ होती है। इंडियन घरों में देखा गया है कि बच्चा जब अपनी माँ की बात सुनकर टीवी देखना या गेम खेलना नही छोड़ता है तो अकसर माँ पिता से शिकायत करने की बात करती है जिसके बाद बच्चा डर जाता है। बच्चा कुछ क्षण के लिए माँ की बात मान जाता है पर हमेशा पापा का डर दिखाने से वह माँ की बात को ठुकराने लगता है और पिता से प्यार करने की जगह डरने लगता है जिस कारण भविष्य में बच्चा जिद्धी बन जाता है या फिर वह डरपोक हो जाता है और दोनों ही बच्चे की विकास के लिए बुरी बातें है।





अपने स्वास्थ्य की जानकारी : पेरेंट्स किसी बीमारी का समाना कर रहे है या फिर मोटापे से ग्रस्त होकर किसी डाइट प्लान का पालन कर रहे हो बच्चे को अपने स्वास्थ्य और डाइट योजना से दूर ही रखें क्योकि अपनी डाइट योजना के कारण कई बार कुछ भोज्य पदार्थ को लेकर बच्चे के मन में संदेह उत्पन्न हो जाता है जिस कारण वह भी उनका सेवन करना बंद कर देते है जिससे बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास नही हो पाता। इसके अतिरिक्त यदि आप किसी बीमारी से ग्रस्त है और आपका कोर्स चल रहा है तो बच्चों को इन बातों से दूर रखें क्योकि कई बारी आपकी बीमारी को लेकर बच्चे आप से अधिक चिंतित हो जाते है जिसके कारण वह ना तो पूर्ण स्टडी कर पाते और ना ही खेल कूद में अपना मन लगा पाते है।





अनजाने में हुई तुलना : 21वी सदी के पेरेंट्स की परवरिश में काफी बदलाव आये है और आज के युवा माता-पिता अपने बच्चों की तुलना किसी दूसरे के बच्चे से नही करते है लेकिन जाने अनजानें आज के यंग और सूझवान पेरेंट्स अपने छोटे बच्चे को बड़े बच्चे की तरह या फिर बड़े बच्चे को छोटे बच्चे की आदतों का अनुग्रह करने को कह देते है और यही तुलना बच्चे में इर्ष्या या हीनभावना जन्म देती है और इससे बच्चों के अपसी रिश्तों में भी खटास उत्पन्न हो जाती है।





बच्चे का स्वभाव चिडचिडा होना : बच्चे की एक गलत आदत के कारण कई बार माता-पिता उसकी सभी अच्छी आदतों को नजरअंदाज कर देते है और हर जगह हर बात पर बच्चे की गलत आदत को सुधारने की दुहाई देते रहते है जो अच्छी बात नही है। हर समय बच्चे को एक गलत आदत के कारण शर्मिंदा करने से उसका स्वाभाव में बदलाव आने शुरू हो जाते है और वह शांत से चिडचिडा हो जाता है।





बच्चे को उत्साहित करने का गलत तरीका : आमतौर पर भारतीय पेरेंट्स बच्चे को उत्साहित करने के लिए बोल देते है यह काम बहुत आसान है और इसमे डरने की कोई बात नही है। असल में माता-पिता जब उत्त्साहित करने के लिए डर शब्द का प्रयोग करते है तो असल में वह खुद नही जानतें कि बच्चे के डर की असली वजह क्या है इसलिए अगली बार अपने दुलारे को उत्साहित करने से पहले उसकी असल दिक्कतों को जाननें का प्रयास करें और फिर उसे दूर करने का प्रयास करें।





स्कूल की मांगों पर गुस्से होना : भारत की मिडल क्लास फैमिली में अकसर देखा जाता है बच्चे की फ़ीस के दिन या फिर एक्टिविटी के लिए के लिए पैसे मांगने पर पिता गुस्से हो उठते है और कह बैठेते है स्कूल वाले सिर्फ लूट रहे है जो सही नही है। आप बेशक आर्थिक रूप से मजबूर है पर आप इससे दूसरे रूप से बचत करने का संदेश दे सकते है लेकिन बच्चा जहाँ स्टडी कर रहा है उस स्कूल की बुराई या टीचर की बुराई से बच्चे के मन पर गलत संदेश जाता है और वह अध्यापक और विद्यालय के आदर में कमी ला देता है इसके साथ-साथ एक्टिविटी में शामिल होने की इच्छा भी समाप्त हो जाती है।

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